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17 Jul 2025 · 6 min read

*तेवरी बनाम गजल*

तेवरी बनाम गजल
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तेवरी-चर्चा की पुस्तक-समीक्षा और माहेश्वर तिवारी का पत्र: 1988
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1980 के दशक की शुरुआत में तेवरी काव्य आंदोलन चला। 1987 में तेवरी-चर्चा पुस्तक प्रकाशित हुई। माहेश्वर तिवारी जी तेवरी को गजल मानते थे जबकि तेवरी काव्य आंदोलन के प्रवर्तक द्वय इसे एक नई काव्य विधा बता रहे थे। मेरे (रवि प्रकाश) द्वारा लिखित पुस्तक समीक्षा सहकारी युग हिंदी साप्ताहिक रामपुर उत्तर प्रदेश के 5 मार्च 1988 अंक में प्रकाशित हुई थी। 10 मार्च 1988 को इस समीक्षा पर माहेश्वर तिवारी जी का प्रतिक्रिया पत्र प्राप्त हुआ था।
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पुस्तक समीक्षा
तेवरी-चर्चा (लेख संग्रह)
लेखक: देवराज एवं ऋषभ देव शर्मा देवराज
प्रथम संस्करण: 1987
तेवरी प्रकाशन, शास्त्री निकेतन, पटेल नगर, खतौली (उत्तर प्रदेश), 251201
मूल्य ₹5
समीक्षक: रवि प्रकाश पुत्र श्री रामप्रकाश सर्राफ, बाजार सर्राफा (निकट मिस्टन गंज) रामपुर, उत्तर प्रदेश
मोबाइल 9997615451
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अट्ठानवे प्रष्ठीय तेवरी-चर्चा का प्राण इसके अंतिम तेईस पृष्ठ हैं, जिसमें श्री माहेश्वर तिवारी से तेवरी-चर्चा शीर्षक से तेवरी काव्य आंदोलन के जनक देवराज द्वय और श्री तिवारी का पत्र-व्यवहार हुआ है। माहेश्वर तिवारी और देवराज द्वय के मध्य पुस्तक में प्रकाशित पत्राचार का आरंभ श्री तिवारी की इस पंक्ति से होता है कि “9 अप्रैल 83 के सहकारी युग में प्रकाशित मेरे पत्र के संदर्भ में आपका दिनांक 13 अप्रैल 83 का लिखा पत्र मुझे मिला।”

पुस्तक में प्रकाशित पत्राचार तेवरी से संबंधित अनेक प्रश्नों और आशंकाओं पर काफी जोरदार बहस का पता देते हैं। जिसमें देवराज द्वय के उत्तर बहुत सधे हुए हैं। अधिक तैयारी के साथ दिए गए हैं। संभवतः पत्रोत्तर के समय ही आगे चलकर सार्वजनिक रूप से प्रकाशित करने की मानसिकता रख कर दिए गए हैं। बहस की हालत यह हो गई कि अपने अंतिम पत्र में माहेश्वर तिवारी यह सवाल उठाने लग गए हैं कि ” तेवरीकार व्यवहारिक जीवन में भी व्यापक जन आंदोलन में हिस्सेदारी निभाएंगे या सिर्फ शाब्दिक सलंग्नता ही होगी।” (प्रष्ठ 93)
इसका जवाब देवराज द्वय यह देने लग गए हैं कि ” यदि आप (माहेश्वर तिवारी) कभी व्यवहारिक सलंग्नता के प्रति रुचि लें तो हमें अवश्य स्मरण रखें।” (पृष्ठ 98)
उपरोक्त पत्राचार पृष्ठ 98 पर समाप्त हो जाता है। वस्तुत: बहस जब इस स्तर पर उतर आए तो उसका समाप्त होना ही अच्छा रहता है। तेवरीकारों को यह स्मरण रखना चाहिए कि अप्रिय विवाद तेवरी को समृद्ध नहीं करते बल्कि कमजोर करते हैं। तेवरी तो सदा जीवित रहेगी अपनी अग्निमय तेवरियों के द्वारा। तेवरी इस देश के काव्याकाश पर एक ऐसी ज्योति की तरह चमकी है जिसमें सब प्रकार के अंधकार को मिटाने, उन्हें उजाला दिखाने की गहरी आस्था है। तेवरी कविता जगत की श्रेष्ठ उपलब्धि है। तेवरी में आक्रोश है, असंतोष है, प्रहार की मुद्रा निश्चित ही है। तेवरी हमारी संपूर्ण व्यवस्था में जो कुछ भी परिवर्तन के योग्य है और अन्याय पर आधारित है; उसे बदलने के लिए कमर कसकर सैनिक की भांति खड़ी है। ऐसी तेवरी निश्चय ही अभिनंदनीय है।

पुस्तक में तेवरी को सामान्य आदमी की कविता, चुनौती की कविता, समय की सजग कविता जो कहा गया है; वह अब तक पत्र-पत्रिकाओं में अनेक तेवरियॉं पढ़कर अक्षरशः सत्य जान पड़ता है। जो तेवरियॉं लिखी जा रही हैं, वे प्रमाण हैं तेवरीकारों की इस घोषणा की कि ” तेवरी जुझारू मनुष्य को तैयार करने का कार्य कविता का मुख्य उद्देश्य मानती है।” (पृष्ठ 74)
सचमुच लोरी गाकर सुनाने वाली कविता के दिन बीत गए हैं। कविता के भविष्य की सार्थकता तेवर में निहित है। कोई तेवरी इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि उसका नाम तेवरी है; उसमें तेवर हैं इसलिए वह महत्वपूर्ण है।

तेवरी क्या है? प्रथम दृष्टि में कह सकते हैं कि हिंदी में गजल आज जिन अनेक नामों से लिखी जा रही है, तेवरी उनमें से एक है। पर तेवरी स्वयं को गजल नहीं मानती। वह उससे कोई रिश्ता भी नहीं रखना चाहती। उसका मत है कि ” गजल जिस कोमलता को लेकर शुरू हुई, उसमें यदि कहीं कोई सार्थक परिवर्तन हुआ तो वह गजल नहीं रही। वह गीतिका, मुक्तिका या प्रगीत कही जाने लगी।” (पृष्ठ 52)
इस समय हिंदी में मात्र कोमल भावनाओं का निर्वाह करने वाली ही नहीं अपितु अत्यंत तीखे आक्रोश, क्षोभ और असंतोष की सामाजिक राजनीतिक अभिव्यक्ति देने वाली कविताएं भी गजल शीर्षक से लिखी जा रही हैं । इस समय लिखी जा रही गजलों में कोमलता भी है, अनेक में कठोरता भी। तेवरी का प्राण उसकी कठोरता होता है। ” तेवरी कड़वी बात कहना चाहती है और कड़वी बात मीठे लफ्जों में नहीं कहीं जा सकती।” (पृष्ठ 54)
मात्र कथ्य का अंतर ही नहीं है। तेवरी ने गजल के शेरों के गठन के अनेक नियमों को मुक्त होकर तोड़ा है और एक नए प्रवाह को स्थान दिया है। सच तो यह है कि गजलों के ढेर में तेवरी की अपनी अलग पहचान आसानी से की जा सकती है।

तेवरी भले गजल न हो मगर गजल शीर्षक से लिखी जा रही अनेक रचनाएं तेवरी हो सकती हैं, ऐसा तेवरीकारों को अमान्य नहीं है। महज प्रेमालाप की जमीन से हटकर अगर असंतोष, आक्रोश, क्रांति और विद्रोह के तेवर रखकर कोई गजल नामधारी कविता कर रहा है तो उसे तेवरी के कोष्ठक में रखा जा सकता है। तेवरी रचना में गजल के शिल्पगत अनुशासन को नकारना तेवरी का अनिवार्य अंग नहीं है। वह अनेक तथाकथित गजलों को तेवरी मानती है। उसका मत है कि ” जो रचना गजल की मान्यताओं से नितांत भिन्न मूल्यों और लक्ष्यों को जी रही थी है या होगी वह न गजल थी न है और न होगी। अब उसे तेवरी नाम दे दिया गया है। हो सकता था इसे कुछ लोग और कुछ नाम दे देते; किंतु अब तो कविता के बदलाव की संपूर्णता को व्यक्त करने वाला नाम तेवरी दे दिया गया है।” (प्रष्ठ 95, 96)
इतना ही नहीं तेवरी के संस्थापकों का यहां तक कहना है कि ” हिंदी वाले अपनी गजल से बहुत दूर हटी हुई रचनाओं को गजल ही कहते हैं तो इसमें हम और आप क्या कर सकते हैं? हमारी दृष्टि में आक्रोश, क्षोभ, क्रांति, व्यंग्य और अन्याय का तीखा विरोध करने वालों तथा संकेत की मुद्रा से निकलकर शब्द को शस्त्र की मुद्रा में लाने वाली रचनाएं किसी भी दृष्टि से गजल नहीं हैं । ऐसी सार्थक रचनाओं के लिए एक निरर्थक नाम को ढोना जड़ता का परिचायक है, हास्यास्पद भी।” (पृष्ठ 78)

माहेश्वर तिवारी ने कई कवियों की गजलों के कुछ अंश देवराज द्वय को लिखे थे। यथा:
पालनों की उम्रों से, अब हमें निकलने दे/ खाक में लथड़ने दे/ पॉंव-पॉंव चलने दे (खाजिद अहमद पृष्ठ 91)
देवराज द्वय उपरोक्त “बहुत सारी” कविताओं को पढ़कर टिप्पणी करते हैं: ” यह कहॉं तक गजल है, हम नहीं समझ पाए। आप या इनके रचनाकार इनको गजल कहते हैं, इससे इनकी तेवरी मानसिकता कहीं भी बाधित नहीं होती। सिवा इसके की निहित कारणों से इन्हें गजल कहे जाने का प्रयास किया जा रहा है। बाहरहाल हम इन्हें गजल की जमीन से हटी हुई रचनाएं मानते हैं।” (पृष्ठ 98)

संक्षेप में तेवरी परंपरागत गजल को उसकी पारिभाषिक कोमलता के दायरे से निकालकर विद्रोह और क्रांति के कथ्य से युक्त नए तेवर से लैस करने वाला तथा अनेक शिल्पगत बंधनों को तोड़ने वाला महान काव्य आंदोलन है। तेवरी ने गजल से बहुत कुछ लिया है, ऐसा तेवरी आंदोलन कर्ताओं को खुले मन से स्वीकार करना चाहिए। ऐसा करने से उनके काव्य आंदोलन का नयापन धूमिल नहीं होता। दूसरी ओर गजल समर्थक किंतु तेवरी विरोधियों को तेवरीकारों का कम से कम इसलिए तो आभारी होना चाहिए कि उन्होंने गजल को समय, समाज और देश की तीव्र आवश्यकता के अनुरूप विचार सामग्री प्रदान की है।
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(रवि प्रकाश द्वारा लिखित यह समीक्षा सहकारी युग हिंदी साप्ताहिक रामपुर उत्तर प्रदेश के 5 मार्च 1988 अंक में प्रकाशित हो चुकी है।)
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श्री माहेश्वर तिवारी की प्रतिक्रिया
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सहकारी युग हिंदी साप्ताहिक में मेरे द्वारा लिखित तेवरी-चर्चा पुस्तक की समीक्षा को पढ़कर माहेश्वर तिवारी जी ने एक पत्र लिखा था।
पत्र इस प्रकार है :-
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प्रकाश भवन ,गोकुलदास रोड ,मुरादाबाद 244001
10-3-88
प्रिय भाई रवि प्रकाश जी
स्नेहाशीष
गीता-विचार की प्रति मिली । सबसे पहले उसके प्रकाशन पर मेरी तरफ से बधाई एवं शुभकामनाएँ स्वीकारें । विस्तृत प्रतिक्रिया बाद में भेजूँगा ।
इस बीच सहकारी युग के ताजा अंक में तेवरी-चर्चा पर आपकी समीक्षा पढ़ी। बेहद संतुलित लगी । बहस के अंत की जहाँ चर्चा की है ,वहाँ समाप्ति के लिए मुझे कोई बहाना चाहिए था क्योंकि दूसरा पक्ष जिस तरह कुछ भी मानने को तैयार नहीं था ,उससे बहस खींचने से भी कोई लाभ नहीं होता । आशा है स्वस्थ सानंद हैं ।
शुभाकांक्षी
माहेश्वर तिवारी
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