मौन स्वीकृति
मौन स्वीकृति
अँधेरी रातों में जब सन्नाटा व्याप्त रहता वह दीया को जलाकर पढती देर रात तक।माँ कहती लड़की होकर इतना उजाला ठीक नहीं।पर थरथराती रही दीये की लौ और दृढ होती गयी आँखों की जिद। बेशक बाहर हल्की सी सरसराहट सी थी परंतु भीतर एक आग थी।पिता ने पुरानी लालटेन सही करके पास मेंजला के रखी। मौन में भी स्वीकृति और विश्वास। परीक्षा में पहले स्थान पर। पहली बार स्नेहपूरित शब्द सुने माँ के…”चल ,चाय बना दूँ।”
मनोरमा जैन पाखी