ढलती शाम
इस ढलती हुई शाम को
तेरा ख्याल आ गया
कैसे समझाऊ दिल को मै
मन मे एक सवाल आ गया
क्यों होती है तलब तेरी
मिलने की ख्वाहिश रहती है
इस तन्हा से मेरे मन मे
तेरी ही यादें बसती हैँ
वो ढलती शाम के साये में
जब तेरा ख्याल आ जाता है
मन में बेचैनी बढती है
कब होंगी मुराद पूरी
जब तेरी जुल्फों के साये में
उस ढलती शाम को देखेंगे
वो जुल्फ सुनहरी तेरी
लगती है सुनहरी बदल जैसी
वो ढलती शाम जब आती है
बस तेरी ही यादें लाती हैँ
जाने कब इस दीदार को
मन में एक टीस उठती है