*"नवीन मित्रता"*
सजीव हृदय की वीणा पर,
नव संगीत जब बज उठता है।
नवीन सखा का साक्षात्कार,
जैसे नूतन प्रभा सा लगता है।
हृदय के बंधन खोल दिए,
नयनों ने नयनों को पढ़ा।
विचारों की उस मीठी धारा में,
मौन संवाद भी बहुत कुछ कह गया।
जो अनजाना था कल तक,
आज आत्मीय क्यों लगने लगा?
जैसे आत्मा की प्रतिध्वनि को,
किसी अन्य रूप में सुनने लगा।
न मोह, न आग्रह कोई,
केवल सहजता की सौगंध।
मित्रता की यह कोमल बेला,
ज्यों बसंत का प्रथम अनुबंध।
चलो साथ कुछ पथ तय करें,
शब्दों से परे भाव कहें।
जहाँ विश्वास ही भाषा हो,
वहीं मित्रता की राह रहें।
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