“ज़िन्दगी का तमाशा”
रिस रिस के जैसे दर्द रवानी पे आ गया,
हर ख़्वाब बेवजह ही कहानी पे आ गया।
जिस मोड़ पर खुदा से मुलाक़ात हो गई,
वो मोड़ एक रोज़ जवानी पे आ गया।
क़िस्मत भी मुस्कुरा के तमाशा बना गई,
हर बोझ ज़िन्दगी का निशानी पे आ गया।
सब लोग पूछते हैं अब हँसते क्यूँ नहीं,
क्या कहें — ग़म भी अब मज़ाक़ उड़ाने पे आ गया।
तन्हा जो रात ढलती थी पहले सुकून में,
अब हर अंधेरा मेरी पेशानी पे आ गया।
सपनों की बात कौन करे इस हयात में,
हर दिन का हिसाब भी किरानी पे आ गया।
इक पल सुकून मांगा था सादगी के लिए,
वो पल भी उधार की कहानी पे आ गया।
ख़ुशियाँ जो थीं किताब में, लफ़्ज़ों में खो गईं,
और ग़म सुलगता हुआ ज़बानी पे आ गया।
अब दर्द भी अजीज़ है, आदत सी बन गई,
कुछ इस तरह वजूद वीरानी पे आ गया।
हर बार जख़्म ओढ़ के चुपचाप रह गया,
Raahi का हौसला भी नाकामी पे आ गया।
✍️✍️Kavi Dheerendra Panchal [ Raahi ]