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16 Jul 2025 · 1 min read

“ज़िन्दगी का तमाशा”

रिस रिस के जैसे दर्द रवानी पे आ गया,
हर ख़्वाब बेवजह ही कहानी पे आ गया।

जिस मोड़ पर खुदा से मुलाक़ात हो गई,
वो मोड़ एक रोज़ जवानी पे आ गया।

क़िस्मत भी मुस्कुरा के तमाशा बना गई,
हर बोझ ज़िन्दगी का निशानी पे आ गया।

सब लोग पूछते हैं अब हँसते क्यूँ नहीं,
क्या कहें — ग़म भी अब मज़ाक़ उड़ाने पे आ गया।

तन्हा जो रात ढलती थी पहले सुकून में,
अब हर अंधेरा मेरी पेशानी पे आ गया।

सपनों की बात कौन करे इस हयात में,
हर दिन का हिसाब भी किरानी पे आ गया।

इक पल सुकून मांगा था सादगी के लिए,
वो पल भी उधार की कहानी पे आ गया।

ख़ुशियाँ जो थीं किताब में, लफ़्ज़ों में खो गईं,
और ग़म सुलगता हुआ ज़बानी पे आ गया।

अब दर्द भी अजीज़ है, आदत सी बन गई,
कुछ इस तरह वजूद वीरानी पे आ गया।

हर बार जख़्म ओढ़ के चुपचाप रह गया,
Raahi का हौसला भी नाकामी पे आ गया।

✍️✍️Kavi Dheerendra Panchal [ Raahi ]

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