काँटा गिन गिन वो थके, गुल का छोड़ सुवास।
काँटा गिन गिन वो थके, गुल का छोड़ सुवास।
अहम लिए जिनके हृदय,खोये नित्य कयास।।
व्याकुल हो मिलते रहे ,अपने अपने मित्र।
करते कल्पित कल्पना, लिए आवृत्ति चित्र।।
अब जिसकी जैसी दशा, जैसा हो आचार।।
वैसे उसकी मित्रता, वैसा ही व्यवहार।।
कहें निराला बात सुन, हे साधो सुखबीर।
करते चल हरदम गमन, धीर लिए गंभीर।।
संजय निराला