"खुल कर मिलिए इनसे"
“खुल कर मिलिए इनसे”
खुल कर मिलिए इनसे,
बहुत दूर से आई हैं बरखा रानी।
बादल की सवारी कर के,
लेकर आई हैं ठंडी कहानी।
मन के सूने कोनों में
गूँज उठी है मधुर रवानी…
छू के गालों को कहती हैं ये,
“मत छुपो छतरी के पीछे,”
हर बूँद में छुपा हुआ है,
कोई सपना, कोई मीठी सी सीख।
पल दो पल को सब भूलो,
भीग के जियो ज़िंदगानी…
खिड़कियाँ खोलो, हवा को बुलाओ,
बूँदों की मस्ती में गा लो,
बरसों से जो दिल ने चाहा,
आज उसे बाहों में पा लो।
पगली-सी ये आई है,
दिल में भरने खुशियां अनजानी… …
कभी मिट्टी की ख़ुशबू जैसी,
कभी चुप्पी की आवाज़ सी,
बरखा कोई मौसम नहीं है,
ये तो खुद में एक राज़ सी।
खुल जाओ, मुस्काओ,
ये ले आई है रवानी…
खुल कर मिलिए इनसे,
बहुत दूर से आई हैं बरखा रानी…
©® डा० निधि श्रीवास्तव “सरोद”