घूंघट में गोरी
घूंघट में गोरी
माथे पर गगरी
चली गोरी पनिया
भरण को नगरी
चिलचिलाती धूप में
जल रही रेत में
चल रही झटपट
मौन हो थकान में
पैरों में छाले पड़े
चल पड़ी दनादन
गुनगनाते गीत में
हिम्मत न हारती
मुख छूपाए ओढ़नी से
आंखें बचाएं सूरज से
मन में है आस लिए
ठंडी पानी भरण को
नाही कोई शिकवा,
नाही कोई शिकायत
थी जिम्मेदारी और
बंदिश कर्तव्य की
गगरी की हर बूंद में
जीवन की कहानी है
उसके संघर्ष ही
उसकी कहानी है
गगरी की पानी ही
गोरी की पहचान है
गरमी में तपती यह
साधन ही कहानी है ।