Sahityapedia
Sign in
Home
Your Posts
QuoteWriter
Account
16 Jul 2025 · 1 min read

घूंघट में गोरी

घूंघट में गोरी
माथे पर गगरी
चली गोरी पनिया
भरण को नगरी

चिलचिलाती धूप में
जल रही रेत में
चल रही झटपट
मौन हो थकान में

पैरों में छाले पड़े
चल पड़ी दनादन
गुनगनाते गीत में
हिम्मत न हारती

मुख छूपाए ओढ़नी से
आंखें बचाएं सूरज से
मन में है आस लिए
ठंडी पानी भरण को

नाही कोई शिकवा,
नाही कोई शिकायत
थी जिम्मेदारी और
बंदिश कर्तव्य की

गगरी की हर बूंद में
जीवन की कहानी है
उसके संघर्ष ही
उसकी कहानी है

गगरी की पानी ही
गोरी की पहचान है
गरमी में तपती यह
साधन ही कहानी है ।

Loading...