प्राण और आत्मा में अंतर
प्राण, जीवन ऊर्जा है जो शरीर से जुड़ी रहती है जबकि आत्मा चेतना है जो मशीन जैसे शरीर को गतिशील, संवेदनशील और व्यवहारिक बनाती है।
प्राण ऊर्जा दो प्रकार से प्राप्त होते हैं-
1- श्वांस के रूप में
2- भोजन के रूप में
ये दोनों प्रकार की ऊर्जा माता के गर्भ में शिशु से एक साथ जुड़ती हैं। भोजन के रूप में शिशु माँ की गर्भनाल के द्वारा प्लेसेंटा से ऊर्जा लेता है और साँस भी वह वहीं से ऑक्सिजन के रूप में लेता है। अर्थात गर्भ में जब शिशु ऑक्सिजन और भोजन लेना शुरु करता है तभी उसमें प्राण आते हैं। इस समय शिशु आत्मा या चेतना रहित मशीन की भाँति एक जीव होता है। जहाँ पर उसके शरीर के अंग वृद्धि कर रहे होते हैं और किस प्रकार कार्य करना होता है उसके लिए खुद को तैयार कर रहे होते हैं। जैसे शिशु गर्भ में भरे तरल या एमनियोटिक फ्लूइड को ही बार-बार अपने फेंफड़ो में भरता है और बाहर निकालता है,जिससे वह बाहर के वातावरण के लिए साँस लेना सीखता है, उसी प्रकार शिशु उसी फ्लूइड को बार अपने पेट के अंदर निगलता है और प्लेसेंटा में छोड़ देता है। जिससे वह बाहर के वातावरण के लिए खाना निगलना और मल त्याग करना सीखता है। उसका हृदय भी गर्भ काल में विकसित होकर धड़कना प्रारंभ कर देता है। इसप्रकार गर्भावस्था के समय जीव केवल एक जिंदा या चालू मशीन होता है।
गर्भ से बाहर निकलते ही शिशु के फेंफड़े काम करना शुरू कर देते हैं और पेट भी। जब बच्चा गर्भ में होता है उस समय तक बच्चे में आत्मा नहीं होती बल्कि जब बच्चा गर्भ का त्याग करता है उस समय उसमें आत्मा प्रवेश करती है। एक तरह से कहें तो जब डिलीवरी होने वाली होती है उसी समय बच्चे में आत्मा प्रवेश करती है। उससे पहले तो बच्चे में केवल प्राण अर्थात ऊर्जा होती है। इसलिए किसी भी जीव को 9 माह का अपना गर्भकाल याद नहीं रहता क्योंकि गर्भ में जिंदा शरीर तो होता है किंतु चेतना नहीं जिसकी वजह से वह दुख, दर्द, सुनना, देखना, सूँघना, सोचना, विचारना इत्यादि कुछ नहीं कर पाता। वास्तव में आत्मा ही चेतना होती है जिसके होने से ही व्यक्ति मशीनरूपी शरीर को बाहरी वातावरण के लिए व्यवहारिक बनाता है।
जन्म के समय ही जीव में आत्मा प्रवेश करती है जिससे उसकी चेतना जाग्रत होती है जिसकी प्रथम उपस्थिति का आभास शिशु के रोने के साथ ही होता है। इसलिए बच्चा होने के तुरंत बाद उसे रुलाया जाता है यह जानने के लिए कि वह चेतन शरीर है या केवल जीवित शरीर है। चेतना शरीर का मतलब आत्मा सहित और जीवित का अर्थ प्राण सहित।
अगर वैज्ञानिक और व्यवहारिक भाषा में समझे तो जिस प्रकार मोबाइल फोन बगैर सिम कार्ड के भी चालू अवस्था में होता है किंतु उपयोगी नहीं होता, बिल्कुल उसी भाँति शिशु गर्भकाल में जीवित या चालू अवस्था में तो होता है किंतु प्रयोगरहित। जिस प्रकार सिम कार्ड डालने के बाद मोबाइल नेटवर्क पकड़ना प्रारंभ करता है उसी भाँति जीव के शरीर में आत्मा आने के बाद ही उसमें चेतना या नेटवर्क आना प्रारंभ होता है। यही आत्मा या चेतना उसे जन्म के कुछ समय पहले ही मिलती है।
बाहर आते भी बच्चा नाक से साँस लेता है और मुँह से दूध पीता है और दोनों से ही ऊर्जा लेता है। यही प्राण ऊर्जा होती है जो मशीनरूपी शरीर को चलाने के लिए जरूरी है। अगर यह प्राण ऊर्जा नहीं होगी तो शरीर में भले ही आत्मा या चेतना हो किंतु वह शरीर सक्रिय नहीं होगा।
अगर जीव के भोजन या साँस में से एक भी रोक दिया जाए तो उसकी मृत्यु हो जाएगी अर्थात प्राण निकल जाएंगे क्योंकि प्राण ही जीव की ऊर्जा है। जब जीव जवान होता है उस समय उसमें प्राण ऊर्जा सर्वाधिक होती जिससे उसका भौतिक शरीर एक उच्चतम आकार प्राप्त कर लेता है किंतु जैसे जैसे जीव बुढ़ापे की तरफ अग्रसर होता है व्यक्ति का भौतिक शरीर और उसके अंग कमजोर होने लगते हैं जिससे वो भोजन और साँस से उतनी ऊर्जा प्राप्त नहीं कर पाते जितनी उनको जरूरत होती है। इसलिए शरीर और भी तेजी से ढलना शुरू हो जाता है और अंग भी तेजी से शिथिल होने लगते हैं। इससे अंगों में प्राण ऊर्जा जरूरत अनुसार नहीं पहुँचती जिससे अंग खराब होने लगते हैं। और एक समय आता है जब या तो मुख्य अंग खराब हो जाते हैं जिससे प्राण ऊर्जा बन नहीं पाती या फिर अंग इतने ज्यादा करजोर हो जाते हैं कि वो भोजन और वायु से प्राण ऊर्जा बना नहीं पाते। इसी के कारण व्यक्ति की मृत्यु हो जाती जिसे अक्सर कहते हैं कि उसने प्राण त्याग दिए अर्थात अपने भौतिक शरीर की ऊर्जा त्याग दी।
अतः मृत्यु के समय पहले शरीर की प्राण ऊर्जा समाप्त होती है अर्थात उसके प्राण बाहर निकलते हैं और कुछ समय पश्चात शरीर से आत्मा बाहर निकलती है। जबकि आत्मा शरीर नहीं छोड़ना चाहती इसलिए वह कुछ दिनों तक वहीं रहती है किंतु जब शरीर ही निर्जीव हो जाता है तो वह उसमें प्रवेश नहीं करती।
इसप्रकार प्राण शरीर को जीवित रखने वाली ऊर्जा होती है जबकि आत्मा जीव की चेतना होती है। इसी कारण जब इंसान की मृत्यु होती है तो उसका सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ या चेतना के साथ संबंधित रहता है और अगले जन्म के लिए अग्रसर होकर पूर्व जन्मों का कर्म या कर्मफल बनता है।
इसतरह जहाँ स्थूल या भौतिक शरीर की स्टोरेज यूनिट डीएनए होता है वहीं चेतन शरीर की स्टोरेज यूनिट यही सूक्ष्म शरीर होता है जो आत्मा के साथ संलग्न रहता है।
प्रशांत सोलंकी,
नई दिल्ली