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22 Jul 2025 · 1 min read

घर थे जो कभी

घर थे जो कभी
अब मकान से लगते हैं
अपने रहते थे यहां
अब अंजान बसते हैं

आते जाते नजरें
टकरा जाती है कभी
निगाहें मिलाने से बचकर
कतरा के अब निकलते हैं

जुङाव और लगाव उनसे
जो दूर बहुत दूर है
शायद पास की नजर
अब कुछ कमजोर है

खानापूर्ति करने को
खाने पर कभी मिलते हैं
शिकवे गिले, गुफ्तगू के सिलसिले
दिल में सिमट के रहते हैं

जब ये नींद के आगोश में
वो रतजगा करते हैं
घर थे जो कभी
अब मकान से लगते हैं

चित्रा बिष्ट

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