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15 Jul 2025 · 1 min read

#सामयिक_ग़ज़ल

#सामयिक_ग़ज़ल
●थपकी दे के बहलाया है।
●प्रणय प्रभात●

●दिल का चैन रूह की ठंडक, ये अपना सरमाया है।
आती-जाती इस दुनिया में, किसने साथ निभाया है?
● दिल के रिश्ते दर्द के नाते, चंद दुआएं कुछ आंसू।
हमने छोटे से जीवन में, अब तक यही कमाया है।।
● क़द से लंबे क़द से छोटे, सिर्फ़ उजाला रहने तक।
काली रात अगर हो जाए, साथ न देता साया है।।
● कसमें-वादे प्यार-मुहब्बत, जज़्बे सारे हवा हुए।
काग़ज़ के कुछ टुकड़ों ने, हर रिश्ते को भरमाया है।।
● साथ हवा के बहना सीखो या उसका रुख़ मोड़ो तुम।
एक बार फिर वक़्त ने आ के, आज हमें समझाया है।।
● उम्मीदें सब बेमानी हैं, हर विश्वास छलावा है।
वो भाया जो मिला नहीं है, जो हासिल कब भाया है?
● देखो तो कुछ गर्म हवाएं, साथ धूप के आई हैं।
अंदर सब कुछ सूख चुका है, बाहर सब मुरझाया है।।
●धमकी तो उपचार नहीं ह, ज़िद वाली बीमारी का।
हमने इक इक हसरत को, थपकी दे के बहलाया है।

संपादक
न्यूज़&व्यूज
(मप्र)

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