हव्य बना दो
///हव्य बना दो///
शुचि साध्य कल्पना की स्फुरणा,
सुधि चेतना का स्नेह आताप।
गगन तारक सा उत्स भरा निर्झर,
अनुवेध कमठ कलेवर चाप।।
ओज भावनाओं की समिधा को,
यजन घृत से संपुष्टि लेकर।
संकल्प रूप उन्हें हव्य बना दो,
आत्म यज्ञ की विज्ञा देकर।।
सुधामयी तुम जग सृष्टि धात्री,
ब्रह्मांड विधाता परमधाम।
परम नियंता अखिल सृष्टि की,
माता तुम ब्रह्म शक्ति ललाम।।
कवित्व वेदना का प्रवाह संतत,
सिद्ध अभिव्यक्ति अमर संगत्व।
प्रबल प्रमेय सा नित्य घनीभूत,
दो ओज प्रदाता कवि कुल तत्व।।
पाषाण हृदय भी ललचाए,
यज्ञ सोम नित पाए।
दो युग प्रत्यावर्तक लेखनी,
संस्कृति शौर्य अपनाए।।
स्वरचित मौलिक रचना
प्रो. रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)