भीड़
ग़ज़ल
भीड़ जब ताली देती है हमारा दिल उछलता है
भीड़ जब ग़ाली देती है हमारा दम निकलता है
हमीं सब बांटते हैं भीड़ को फिर एक करते हैं
कभी नफ़रत निकलती है कभी मतलब निकलता है
हमीं से भीड़ बनती है हमीं पड़ जाते हैं तन्हा
मगर इक भीड़ में रहकर बशर यह कब समझता है
वो इक दिन चांद की चमचम के आगे ईद, करवाचौथ
मगर क्यों साल-भर पीछे से इक ज़ीरो निकलता है
भीड़ जब अपनी जांनिब हो, बड़ी बेदाग़ लगती है
हो अपने जैसे दूजों की तभी ये ज़हन चलता है
-संजय ग्रोवर