कहां लौटा करते हैं कभी, गुज़रे ज़माने कैसे मिले भला हमें अब
कहां लौटा करते हैं कभी, गुज़रे ज़माने कैसे मिले भला हमें अब वो यार पुराने
अब तो वो दौर भी कहां रहा, ए-दोस्त मुलाकातें हो जाती थी जब जाने-अंजाने
जाते-जाते तूने लौट आने के वादे किये थे फिर
आई क्यूं नहीं तू किए वादे निभाने
तेरी तस्वीरें देख आज दर्द उठा दिल में अच्छा है आंख में नमी तो है इसी बहाने
अब तो सब ओर दौलत का ही कचरा है कहां मिलते हैं अब, सीपियों के खजाने
अब यह जमाना वो पहले जैसा नहीं रहा अब परिंदे नहीं आते छतों पे संदेशे सुनाने
मुझे एक फकीर की बात आज भी याद है कि अपने ही तो हो जाते हैं अक्सर बेगाने
तेरी कही हर बात अब भी मेरे दिल में है तेरे दिल में खैर अब जो भी है वो तू जाने
अब तू चाहके भी मिल ना सकेगी
‘ रोज बदला करते हैं हम फकीरों के ठिकाने….💗