छिपा सत्य
जरूरी नहीं कि हम किसी बात को जैसे हमेशा देखते जैसे सोचते हैं वह वैसे ही हो क्योंकि जंगल में फैली आग देखकर हम कभी भी सही से नहीं बता सकते कि वो कैसे लगी होगी ।
हमने किसी से जो सुना या दूसरे के दिखाने से जो देखा उसी को मन में सत्य मान लेते हैं।
हमने सोचा वो किसी ने जानबूझकर लगाई या फिर किसी से गलती से लग गयी जबकि वास्तव में वो हवा में उड़ी दूर कहीं से आयी चिंगारी के कारण लगी ।
सत्य बिल्कुल ऐसे ही छिपा होता है । बस हमारी सकारात्मक बुद्धि विवेक और सकारात्मक सोच ही उसे अच्छे से पहचान सकती है ।