बिना रुके
फिसल कर जब गिरी
तो चोट पैरों में तो नहीं आई
लेकिन….
दिल के किसी कोने में
दरकने की बिना आवाज़ के
एक दर्द भरी आह आई
लगा जैसे….
हृदय का कोई टुकड़ा टूट कर फर्श पर आ गिरा हो
हाथों को फ़र्श पे रख
उठी और उठकर खड़ी हुई
लोगों का ताता लग गया
हाल पूछ रहे थे मैडम चोट तो नहीं आई
हौले से सिर हिला दिया
नहीं…नहीं बिल्कुल भी नहीं
पर कुछ तो चोट खाकर चकना चूर हो गया था
जिसे बताने में असमर्थ थी
बस होठों पे बनावटी मुस्कुराहट लिए
बिना सांसों की रफ्तार का हिसाब किये
आगे बढ़ती चली आई
ना पीछे मुड़ कर देखा,
ना आँखों से छलकते आँसुनों को
बस चलती चली आ रही थी
बिना किसी को देखे
जो गिर गया था मेरा टूट कर कुछ हिस्सा
ना उठा सकी उसे भी।।
मधु गुप्ता “अपराजिता”