हसरतें
मर जाती है हसरते
मजबूरियों के सामने
करवटें बदलती रहती
गृहस्ती की जिम्मदरियाँ
उनको निभाते निभाते
कमर झुक जाती है
सरपट दौड़ती अभिलाषाएं
बनाती है अपना प्रतिबिंब
व्याकुल होती जीवन की रेखाएं
और नजर आती है ।
चेहरे की झुर्रियाँ
करती है इशारा
मानो जैसे समय थम सा गया हो ।
मगर ऐसा होता नहीं
समय की चादर में
लिपट जाता ।
एक दिन आदमी
किंतु उसके
अरमान और जज्बात
मरते नहीं अमर हो जाते है
यही सोच कर
अगले पल कुछ अच्छा होगा
कोई तो होगा
जो हमारी पीर सुनेगा ।
जन्म से पहले इच्छाएं मरेगी नहीं ।
और चीख अब मेरी दबेगी नहीं ।
लेकिन ये बेदर्द जमाना है ।
फरियाद का जहाँ कोई ठिकाना नहीं
एक मुट्ठी भर रेत की
जिंदगी में कहाँ आराम ।
ओर समेट लेता आदमी
पैर चादर के हिसाब से
बाकी कुछ नही साहब ।।
डॉ अमित कुमार बिजनौरी
कदराबाद खुर्द स्योहारा
जिला बिजनौर
उत्तर प्रदेश