मुहब्बत की राहों में, क्या क्या सपने थे अपने।
मुहब्बत की राहों में, क्या क्या सपने थे अपने।
मग़र तल्खियाँ ऐसी छायीं, बिखर गए सब सपने।
छेड़े रात चाँदनी जब जब, दिल के जज़्बातों को।
उलझे अश्रु दृग कोरों में, जैसे अंकुर लगे पनपने।
डा. राम नरेश त्रिपाठी ‘मयूर’