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14 Jul 2025 · 1 min read

#देसी_ग़ज़ल

#देसी_ग़ज़ल
■*पीटते हैं ढोल वो।।*
(प्रणय प्रभात)

*मोल खो कर के बने बेमोल वो।
बोलते हैं बेतुके से बोल वो।।

*भेड़ बन के घूमते थे कल तलक।
शेर का ले आए हैं अब खोल वो।।

*शोरबा देने का वादा भूल कर।
आज ले कर आ गए हैं झोल वो।।

*उंगलियां कानों में जनता ठूंस ले।
इसलिए बस पीटते हैं ढोल वो।।

*भौंकना इक दूसरे पर क्या ग़लत?
जानते इक दूसरे की पोल वो।।

*उनसे बच कर के निकलते हैं फ़क़ीर।
छीन कर ले जाएं ना कशकोल वो।।

*सोच में जिनके भरी खलनायकी।
कर रहे हैं नायकों का रोल वो।।

*साहसी, बेबाक, ना विद्वान हैं।
रात दिन जो कर रहे बकलोल वो।।

*बस्तियों मदमस्य बेमतलब नहीं।
भांग कूपों में गए हैं घोल वो।।

●संपादक●
न्यूज़&व्यूज (मप्र)

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