#देसी_ग़ज़ल
#देसी_ग़ज़ल
■*पीटते हैं ढोल वो।।*
(प्रणय प्रभात)
*मोल खो कर के बने बेमोल वो।
बोलते हैं बेतुके से बोल वो।।
*भेड़ बन के घूमते थे कल तलक।
शेर का ले आए हैं अब खोल वो।।
*शोरबा देने का वादा भूल कर।
आज ले कर आ गए हैं झोल वो।।
*उंगलियां कानों में जनता ठूंस ले।
इसलिए बस पीटते हैं ढोल वो।।
*भौंकना इक दूसरे पर क्या ग़लत?
जानते इक दूसरे की पोल वो।।
*उनसे बच कर के निकलते हैं फ़क़ीर।
छीन कर ले जाएं ना कशकोल वो।।
*सोच में जिनके भरी खलनायकी।
कर रहे हैं नायकों का रोल वो।।
*साहसी, बेबाक, ना विद्वान हैं।
रात दिन जो कर रहे बकलोल वो।।
*बस्तियों मदमस्य बेमतलब नहीं।
भांग कूपों में गए हैं घोल वो।।
●संपादक●
न्यूज़&व्यूज (मप्र)