दोहा पंचक. . . . . नवयुग
दोहा पंचक. . . . . नवयुग
कितना दूषित हो गया, वर्तमान माहौल ।
लाज, धर्म, ईमान का, उड़ता आज मखौल ।।
सिर से पल्लू उड़ गया, नहीं नयन में लाज ।
रोक -टोक भाती नहीं, नये दौर को आज ।।
कल से पीढ़ी आज की, माना थोड़ी तेज ।
दम्भ,क्रोध से पर सदा, रहती वो लबरेज ।।
पहली पीढ़ी मौन अब, देख आज का हाल ।
परामर्श पर आज की, पीढ़ी करे सवाल ।।
कुछ तो ऐसी बात है , नव पीढ़ी में यार ।
मन में जो यह ठानती, उसे करे साकार ।।
सुशील सरना / 13-7-25