पुकारती पुस्तकें
हम भी थे कभी ज्ञान के दीप,
अब धूल में सने, पड़े चुपचाप,
कभी जिन पन्नों ने इतिहास रचा था,
आज उन पर चढ़ी है विस्मृति की राख।
कोई आता था, स्पर्श से जीवंत करते,
हर मोड़ पर पन्ने खुलते थे,
भावों में बहती थी रसधार,
अब सन्नाटा है, कुछ न बोलते।
ओ पाठक! सुनो हमारी गुहार,
हम नहीं मात्र कागज़ और स्याही,
हम युगों की साँझा साँसें हैं,
हममें छिपी है अनगिनत गाथाएँ अथाह।
अब सब कुछ स्क्रीन पे सिमट गया है,
पर क्या तुमने कभी अनुभव किया है,
उस पुराने पृष्ठ की खुशबू में,
किसी युग की साँझ रचती गई है?
हमने ही सिखाया था तुम्हें
पहली बार वर्ण, श्लोक, शौर्य की बात,
अब हम चुपचाप अलमारियों में,
करते हैं एक मूक प्रतिज्ञा हर रात।
हमारी आत्मा जाग उठती है,
जब कोई उँगली हल्के से पन्ना पलटती,
हर शब्द, हर चित्र, हर व्याख्या —
मानो फिर से जीवन में गति भरती।
ओ प्रिय पाठक, लौट आओ!
हम नहीं रूठे हैं, बस उदास हैं,
तेरे एक स्पर्श से खिल उठेंगे,
हमारे मौन में भी संवाद हैं।
नई तकनीकें, नया युग सही,
पर कुछ अनुभव छपते हैं केवल पृष्ठों पर,
ज्ञान डाउनलोड नहीं होता,
वह अनुभव और संवाद से पनपता है।
कभी बैठो फिर उस शांत कोने में,
जहाँ हर किताब करती है प्रतीक्षा,
हम आज भी हैं, यहीं, सजीव,
तुम्हारी एक दृष्टि को तरसती, निश्छल आकांक्षा।