मेघ मिलन
पवन की पायल छनक रही थी,
कजरारी घटा चुपचाप चली,
धरती जैसे बाँहें पसारे —
अपने प्रियतम की बाट तकी।
कोयल चुप, चातक बोले,
हर पत्ता साँसें लेने लगा,
प्रकृति की पलकों पर ठहरी,
एक अधूरी बात कहने लगा।
गगन ने भेजी प्रेम-पाती,
बूँदों के अक्षर में लिपटी,
धरती की पलकों पर गिरकर,
हर पीड़ा धीरे-धीरे सिपटी।
कच्चे आँगन, टूटी छतें,
खपरैलों पर नाच रही बूँदें,
बचपन की माटी मुस्काई,
जैसे कोई माँ यादों में गूँथे।
मधुयामिनी की गोद में बैठा,
मन कवि बना, सावन गाया,
हर बूँद में प्रिय की मुस्कान,
हर बूटी ने मृदु राग सुनाया।
नदियों ने खोले मन के द्वार,
वृक्षों ने झुककर वंदन किया,
धरती और आकाश के बीच,
प्रेम का पहला चुम्बन हुआ।
बिजली की लहरें मचल उठीं,
घटा मुस्काई शर्माई-सी,
धरती सजी सिंगार में ऐसी —
जैसे दुल्हन पहली बार सजी।