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13 Jul 2025 · 1 min read

"गुफ़्तगू" ग़ज़ल

पल मेँ, सदियों का क्यूँ, हिसाब कर गया कोई,
यकबयक रुख़ को, बेहिज़ाब, कर गया कोई।

ज़ुल्फ़े-स्याह-ए-हसीँ, खुली तो शाम हो गई,
क्यूँ था तौहीन-ए-सहाब कर गया कोई।

हुए हैं रश्क-ज़दा, जामो-साग़रो-मीना,
नज़र से रुसवा-ए-शराब कर गया कोई।

अभी आता हूँ, आ रहा हूँ, आ गया लो मैं,
दीद को अपनी, ज्यूँ सराब कर गया कोई।

हुआ था क्या, कि अचानक जो आँख खुल गई,
अपनी आमद को, दर्जे-ख़्वाब कर गया कोई।

आइना सँवर गया, ये कौन रूबरू गुज़रा,
उम्र, लबरेज़-ए शबाब कर गया कोई।

मुझको “आशा” थी, गुफ़्तगू की भले मुद्दत से,
बिन कहे कुछ भी, लाजवाब कर गया कोई..!

सहाब # बादल, clouds
सराब # मृग मरीचिका, mirage

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