चरण शरण तुम्हारी
///चरण शरण तुम्हारी///
धाता तुम ही विधाता तुम ही तुम ही जगत के पालनहार
तुम बिन मेरा कौन जगत में जहां जाऊं मैं हे जगदाधार
पीवक से लेकर अनंत ब्रह्मांडों में रूप तुम्हारा ही पाता हूं
तुमने ऐसी सृष्टि रची है कोई समझ ना पाता हे करतार
प्रभु चरणों में यह आदेश नहीं है यह तो विनय हमारी
तुमसे ही कल्याण सभी का फिर भी विकल सृष्टि सारी
चेतन और अवचेतन में तुमने ऐसी ही मति भर रखी है
कैसे करुं पुकार तुम्हारी हममें भरी स्वार्थ बुद्धि संसारी
प्रभु तुम भी तो इस जगत में ऐसी ही लीला रचते हो
चोखोबा की गाय चराते सेना बन हजामत करते हो
संत जना संग दलते आटा कृष्ण बनकर देते उपदेश
सखियों संग रास रचाते शबरी के जूठे बेर खाते हो
काल तुम हो आकाश तुम हो तुम ही चेतन सत्ता हो
धरती तुम बीज तुम वृक्ष फल तुम ,तुम ही भोक्ता हो
साक्षी रूप परमात्म तत्व तुम कण कण में आय बसे
तुम ही स्फुरणा तुम ही वाचा तुम ही तो प्रभु वक्ता हो
जैसी बुद्धि दिया है तुमने वैसा होता मुझसे कार्य यहां
तुम बिन मेरा शरण कौन है जिनसे लूं गुरु ज्ञान यहां
महाप्रभु चैतन्य बनकर कभी कोड़े खाते हो म्लेच्छों के
मन बुद्धि मेरी चकरा जाती है तुम बताओ जाऊं कहां
स्वामी को हम दास बनाते दास बनाकर पास बुलाते
स्वार्थ बुद्धि फलवती करने को प्रभु को ही ललचाते
परिष्कृत होवे मन बुद्धि हमारी ऐसा दो वरदान प्रभु
चरण शरण स्वीकार करो हे यूं सबको क्यों बहलाते
स्वरचित मौलिक रचना
प्रो. रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)