मिट्टी में ब्रह्म — बीज की आत्मगाथा एक मौन उद्घोष में
मैं बीज —
संभावनाओं की सुप्त संहिता,
मिट्टी में लोटता, पर स्वप्नों में आकाश नापता,
छोटा सही, पर अनंत का अंकुर हूँ मैं।
लोगों ने मुझे पैरों तले रौंदा,
किंतु मैं मौन रहा —
क्योंकि मुझे ज्ञात था,
विनाश ही मेरा उद्गम है।
मुझे गाड़ा गया पृथ्वी की कोख में,
जहाँ न प्रकाश था, न प्रार्थना,
केवल नमी थी —
जो मृत्यु सी प्रतीत होकर भी, जीवन की यंत्रणा थी।
मैं सड़ता गया…
टूटता गया…
अपनी सीमाओं से विद्रोह करता गया,
और वहीं से फूटा मेरा प्रथम आत्माक्षर —
अंकुर।
कोई नहीं था स्वागत को,
ना वंदन, ना अभिनंदन।
मैंने धरती की छाती चिरी,
और आकाश से दृष्टि मिलाई।
तब लोग कहने लगे —
“यह तो वृक्ष है! छाया देता है, फल देता है,
इसकी पूजा करो,
यह जीवनदाता है!”
हे मूढ़ों!
कभी झाँका है उस अंधेरे में?
जहाँ मैं मिट्टी के संग विलीन हुआ था?
कभी अनुभव किया है वह पीड़ा,
जब कोई अस्तित्व बनना चाहता है,
पर स्वयं को खोकर?
मैं बीज हूँ —
निराकार में आकार की इच्छा,
मरण में जन्म का गीत,
और अपमान में आत्मगौरव का दीप्त स्तम्भ।
यदि तुमने मुझे समझा होता,
तो जान जाते —
प्रत्येक उपेक्षित कण में ब्रह्म का स्पंदन है,
प्रत्येक नष्ट होते अस्तित्व में सृष्टि की संभावना है।