मनस्विता का दीप
जब चहुँओर छाया हो अंधकार,
जब आशाएँ हो रही हों निराधार,
तब भी न हो विचलित तू मनुज,
तेरा मनबल है तेरी विजय की पुकार।
संकटों की जितनी भी हो कठिनाई,
उठ खड़ा हो तू, बन जलधि-तुल्य गहराई।
न भयों से कांप, न शंकाओं से थरथरा,
तेरे अंतर में छिपा है दिव्य सहारा।
विपदाएँ चाहे कूट-कूटकर आएँ,
प्रलयंकारी ज्वालाएँ भी राह में छाएँ,
तू अपने संकल्प-शक्ति से अडिग रह,
हर घड़ी नव प्रभा का संदेश कह।
नियति के तीव्र प्रहारों से न डर,
सहर्ष सह ले तू आँधियाँ, यदि हृदय हो निर्भर।
अविचल धैर्य, अचल साहस, और दृढ़ निश्चय के साथ,
रच दे तू जीवन की नवोन्मेष कथा।
संसार की सारी बाधाएँ, तुझसे डरें,
तेरे स्वाभिमान के सम्मुख नतमस्तक हों क्षण भरें।
क्योंकि तू वही है, जो असम्भव को सम्भव करे,
जो पतझड़ में भी वसंत की कोपलें धरे।
याद रख, यह जगत उसी को वंदन करता,
जो चिर संघर्ष में भी विजय का गर्जन भरता।
जो न भागे विषम पथ से, न रोए नियति को,
बल्कि साधे पग-पग पर जीवन की युक्ति को।
हे मनुज! तू दृढ़प्रतिज्ञ, तू अभेद्य चट्टान,
तेरे भीतर छिपा है सत्य, शिव और सुंदर का गान।
निज मनोबल से तू पर्वत भी मोड़ सकता है,
और शून्य से भी शिखर का सिंहासन जोड़ सकता है।
इसलिए मत कर पलायन, मत माँग किसी से करुणा,
तू स्वयं है संघर्ष की गाथा, तू स्वयं है विजय की वारुणा।
चल, उस पथ पर जहाँ काँटों का तांडव हो,
और सिद्ध कर दे — मनुज यदि चाहे तो,
दुस्तर से दुस्सह पथ भी सरल हो।