पथ का स्वर
पथिक! तू पथ न भूल जाना,
धूलि में जो लिपटी राहें हैं,
वहीं कहीं संचित हैं सपने,
संघर्षों की प्रबल आहें हैं।
कंटकों से सजी डगर यह,
कभी करुण, कभी कठोर सी,
पर इसी पर बिछे हैं मोती,
तेरी साधना की ओर सी।
कभी नभ अंधकारमय होगा,
कभी दीप बुझते देखेगा,
पर तू नयन बंद मत करना,
न हृदय में शंका रेखेगा।
यौवन जब हो उन्मत्त निरंतर,
मन भागे मृगजल के पीछे।
बिखरे सपनों की झंझा में,
पथ त्यागे मोहक संकेतों में।
तब भी पथिक! न भटको तुम,
संयम से दीप जलाए रह।
जहाँ सहज सुख की सौरभ हो,
वहीं अधिक विपथ की राह कह।
चल अनवरत! धैर्य धर के,
प्रभात स्वयं द्वार खोलेगा,
हर थकावट अमृत बन जाएगी,
जब लक्ष्य तुझे आलिंगेगा।
कृश तन, किंतु मन तेजस्वी हो,
निःशब्द भी गाथा कह जाए,
जहाँ पग थमे, वहाँ युग बोले,
“पथिक! तू इतिहास बन जाए।”
किसी वृक्ष की छाया मत छाँव समझ,
यह विश्राम तेरा न ठहराव हो,
विराम हो क्षणिक प्रेरणा मात्र,
पर पथ न तेरा बिसराव हो।
स्मरण रहे! तू नहीं मात्र गमनकारी,
तू पथ का सृजक है, पथिक महान!
अतः पग-पग पर दीप जलाकर,
रच दे नवयुग का स्वर्णिम निदान!