क्यों करता अभिमान रे वंदे
क्यों करता अभिमान रे वंदे
क्यों करता अभिमान।
आना जाना सृष्टि संवत है
अनुचित रहे मचान।।
संजय निराला
क्यों करता अभिमान रे वंदे
क्यों करता अभिमान।
आना जाना सृष्टि संवत है
अनुचित रहे मचान।।
संजय निराला