उधड़ा हुआ ज़माना
ग़ज़ल
ये तो हारा हुआ घराना है
इस ज़माने को क्या हराना है
ये तो बचपन से मैंने देखा है
ये ज़माना भी क्या ज़माना है
वक़्त से दोस्ती करो कैसे
वक़्त का क्या कोई ठिकाना है
सच का हुलिया ज़रा बयान करो
सच को सच से मुझे मिलाना है
सचके बारे में झूठ क्या बोलूं
सच भी झूठों के काम आना है
ये जो उधड़ा हुआ ज़माना है
फिर सिलाना या फेंक आना है
मेरा जो सच है, मेरा अपना है
इसको झूठा नहीं बनाना है
-संजय ग्रोवर