वसुधा का शृंगार बढ़ाने
वसुधा का शृंगार बढ़ाने,पावन सावन आता।
जीव जन्तु के जग जीवन से, जो है रखता नाता।।
रिमझिम रिमझिम बारिश होती,बिजली रह रह कड़के।
प्रेम अग्नि तब उर में जलती, धक- धक दिल भी धड़के।।
सजनी साजन का उर चहके,प्रेम अग्नि दहकाता।
वसुधा का शृंगार बढ़ाने,पावन सावन आता।।
रिमझिम रिमझिम सावन बरसे,हर्षित हो बालाएं।
हरे वस्त्र ही धारण करतीं, हरी चूड़ियाँ भाएं।
हरी भरी यह दुनिया लगती,दृश्य मधुर बन जाता।
वसुधा का शृंगार बढ़ाने,पावन सावन आता।।
दिव्य महीना यह भोले का,बहे भक्ति की धारा।
भाँग धतूरा शिव को चढ़ता,लगे भोग जो प्यारा।
भक्ति शक्ति से साधक शिव से,इच्छित वर भी पाता।।
वसुधा का शृंगार बढ़ाने,पावन सावन आता।।
डॉ ओम प्रकाश श्रीवास्तव ओम