दोहा सप्तक. . . . . माटी
दोहा सप्तक. . . . . माटी
साथ चले कुछ दूर फिर, लौट गए सब मीत ।
माटी में माटी मिली, जीवन हुआ अतीत ।।
साँस रुकी तो अजनबी , हुआ सकल संसार ।
माटी से ही रूठ गया, माटी का परिवार ।।
कितना करता जीव यह ,साँसों पर अभिमान ।
मुट्ठी भर अवशेष हैं, माटी की पहचान ।।
माटी से माटी कहे, माटी की यह बात ।
माटी – माटी एक है, माटी की क्या जात ।।
तोड़ घरौंदा उड़ चला, भव सागर के पार ।
कल तक था साकार जो , खो बैठा आकार ।।
जब तक साँसें देह में, चलें सभी सम्बंध ।
देह मिटी फिर मिट गई, संबंधों की गंध ।।
रिश्ते नाते रौनकें , पल दो पल का खेल ।
देह मिटी होता नहीं, जीवन से फिर मेल ।।
सुशील सरना /