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11 Jul 2025 · 1 min read

दोहा सप्तक. . . . . माटी

दोहा सप्तक. . . . . माटी

साथ चले कुछ दूर फिर, लौट गए सब मीत ।
माटी में माटी मिली, जीवन हुआ अतीत ।।

साँस रुकी तो अजनबी , हुआ सकल संसार ।
माटी से ही रूठ गया, माटी का परिवार ।।

कितना करता जीव यह ,साँसों पर अभिमान ।
मुट्ठी भर अवशेष हैं, माटी की पहचान ।।

माटी से माटी कहे, माटी की यह बात ।
माटी – माटी एक है, माटी की क्या जात ।।

तोड़ घरौंदा उड़ चला, भव सागर के पार ।
कल तक था साकार जो , खो बैठा आकार ।।

जब तक साँसें देह में, चलें सभी सम्बंध ।
देह मिटी फिर मिट गई, संबंधों की गंध ।।

रिश्ते नाते रौनकें , पल दो पल का खेल ।
देह मिटी होता नहीं, जीवन से फिर मेल ।।

सुशील सरना /

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