अजनबी दोस्त
थोड़ी दूरियां क्या बढ़ी कि
अजनबी बन रहे हैं अब दोस्त भी
बात करते थे पहले घंटों जो
शायद भूल गए हैं अब वो दोस्त भी।
जो पूछते थे हाल हर सुबह मेरा
अब महीनों से खामोश हैं सब
जिनके बिना दिन नहीं गुजरता था
आज वो याद भी नहीं करते अब।
कभी जो आंखों में पढ़ लेते थे बात
अब नजरें भी चुरा लेते हैं साथ
वो ठहाके, वो किस्से, सब धुंधले हो गए
जबसे छोड़ गए हैं वो मेरा साथ।
वो वक़्त जो साथ बिताया था हमने
अब बस तस्वीरों में सिमट आया है
कभी कहते थे – “हमेशा साथ रहेंगे”
वक़्त ने शायद उन्हें भी भुलाया है।
शिकायतें नहीं हैं, बस हैरानी है
कैसे दोस्ती इतनी आसानी से बेगानी हो गई
जिसने बांटी थी ख़ुशियां और ग़म
आज उसके लिए ये सब एक कहानी हो गई।
कभी किसी बहाने से जो मिलते थे
अब उनके पास मिलने के लिए वक़्त नहीं
जिसने हर मोड़ पर साथ दिया था
अब उसी को पहचानने का हक़ नहीं।
कभी दिनभर मैसेज से दिल भरता नहीं था
अब मैसेज देखकर जवाब भी नहीं आता
वक़्त और व्यस्तता का बहाना बनाकर
अब वो कभी मिलने भी नहीं आता।
पर शायद यही दुनिया की रीत है
जहाँ मतलब बदलते ही मिज़ाज भी बदलते हैं
हम आज भी उसी मोड़ पर खड़े हैं
मगर यहाँ वो दोस्त अब अजनबी लगते हैं।
फिर भी दुआ है उन सबके लिए
जिन्होंने साथ छोड़ आगे बढ़ने को चुना
कि ज़िंदगी उन्हें खुशियों से भर दे
पूरा हो हर एक सपना जो कभी उन्होंने बुना।