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11 Jul 2025 · 1 min read

मुक्ति का मरुस्थल

मैं शादी नहीं करूंगा, मैं कंवारा ही मरूंगा।
तुम गुलाम उसको करके, खुद भी गुलाम होना।
मैं मुस्कान बिखेरूंगा तुम पैसे समेट लेना।
तुम आजादी चुकाकर सम्मान को चुन लेना।
मैं अपमान के झोले में आजादी समेट लूंगा।
मैं शादी नहीं करूंगा, मैं कंवारा ही मरूंगा।
तुम मरुस्थल इसे कहोगे , मैं मुक्ति इसे कहूंगा।

तुम पीढ़ी नई बनाना ,मैं पीढ़ियां संवार दूंगा।
तुम चिंगारी नई देना, मैं मशाल बना दूंगा।
उदासी जो कभी आए तो महफिल में मेरी आना।
मैं रंग बिखेर दूंगा तुम हंसते हुए जाना।
तुम बंधन हजार कसना, मैं आजाद ही उड़ूंगा।
मैं शादी नहीं करूंगा, मैं कंवारा ही मरूंगा।
तुम मरुस्थल इसे कहोगे , मैं मुक्ति इसे कहूंगा।

न ख्वाहिश न चिंता न ग़म कोई छुएगा।
कंवारा जो रहेगा जीवन वही जिएगा।
तुम जिम्मा यही उठाना , मैं जिम्मेदारी उठाऊंगा।
तुम आंगन के दीप जलाना मैं संसार सजाऊंगा।
तुम परंपराएं ढोना, मैं उनकी अर्थी बनाऊंगा।
तुम घर की सुरक्षा लेना, में तूफा से लड जाऊंगा।
तुम नाम अपना बचाना, मैं खुदको भी मिटाऊंगा।
तुम गृहस्थी चुन लेना , मैं आजादी को चुनूंगा।
तुम तानों से बचते रहना,मैं ताने नए बुनूंगां।
मैं शादी नहीं करूंगा, मैं कंवारा ही मरूंगा
तुम मरुस्थल इसे कहोगे , मैं मुक्ति इसे कहूंगा।

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