दोहा पंचक. . . . . प्यार
दोहा पंचक. . . . . प्यार
सच्चा सावन आँख का, सच्ची मन की पीर ।
तुझ बिन व्याकुल राँझना , तेरे मन की हीर ।।
जिसको आँखें ढूँढती, वह बैठा परदेस ।
बेदर्दी की याद से, दिल को लगती ठेस ।।
जीवित सच्चे प्यार की, दिल में रहती याद ।
तनहाई में दिल करे, यादों से संवाद ।।
कैसे कहना छोड़ दूँ, उसको सच्चा मीत ।
अधरों पर जिसने लिखा, अमर अधर का गीत ।।
मिलना सच्चे प्यार का, दुर्लभ जग में यार ।
कसमों का है जलजला, यह सतरंगी प्यार ।।
सुशील सरना / 11-7-25