आँखें
बरामदे में खाट पर पड़ी
वृद्ध पिता की पथराई आँखें
तलाशती हैं
अपने बच्चों को
जो थोड़ी देर साथ बैठें
पिता की आँखें देखकर
समझ जाएँ उनके दर्द
जैसे उनके बचपन में
वह पिता झट से समझ जाता था
और पल में एक फूँक से
उनके सारे कष्ट हर लेता था
समय बदल गया है
आईने ने संस्कार के विकृत रूपों को
तरह-तरह से दिखाया है
पथराई आँखों में सिर्फ
उम्मीदें हैं,सपने हैं
घरों में चलते हुए कुछ लोग
अपने हैं
हाँ, सपने हैं।
–अनिल मिश्र