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11 Jul 2025 · 1 min read

शरण वत्सल

///शरण वत्सल///

जीवन की अनुलेखित गाथा,
प्रभु तुम्हें पूछने आया।
आदि सृष्टि से नित्य प्रवासी,
अब तक लक्ष्य न पाया।।

परम लक्ष्य की प्राप्ति हेतु,
पथ के अवरोध देख घबराया ।
माया मोह से नहीं निकल कर,
क्योंकर नित्य वृथा भरमाया।।

अंतर भाव से न देख सका,
कैसी यह वृति कैसी वह गाथा।
अभिलषित श्रुति-सत्य विहीन,
सम्मुख तेरे आज टेकता माथा।।

काम्य प्रवणता क्यों देह में,
हे वत्सल तुम्हारी शरण गहूं।
सहज सत्य स्वीकार हृदय से,
परम शांति पथ लक्ष्य लहूं।।

आत्म तत्व तुम जगत्राता,
पा सकूं तेरा शुचि भास्वर रूप।
करो कृपा हे जगन्नाथ प्रभु,
सदा विभाषित हो तेरा स्वरूप।।

स्वरचित मौलिक रचना
प्रो. रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)

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