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11 Jul 2025 · 1 min read

वो टांग खींच न ले

ग़ज़ल

गो तीर छूटा पर हदों के दरमियान रहा
न बेईमान हुए और न ईमान रहा

पहुंच भी पाऊंगा मंज़िल पे, ख़ुद पे शक़ है मुझे
मैं आए दिन अगर उतारता थकान रहा

मैं बूढ़े घाघ तर्जुबों से बचके रहता हूं
यही है राज़ कि मासूम और जवान रहा

वे अपने बारे में थोड़ा तो जानते होंगे
मुझे था उनपे, उन्हें ख़ुदपे ये ग़ुमान रहा

लो एक तीर भी साबुत-कमर नहीं निकला
मैं ख़ामख़्वाह ही ताने हुए कमान रहा

छुआके पांव, दुआएं तो उसको दी मैंने
वो टांग खींच न ले, ये भी मुझको ध्यान रहा

-संजय ग्रोवर

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