डरता है दिल अब भी ज़माने की निग़ाहों से
डरता है दिल अब भी ज़माने की निग़ाहों से
चाहा है चाँद को शायद यही अपना क़सूर है।
बेशक़ कागज़ के फूलों में ख़ुशबू नही होती
इश्क़ के ख़ुमार से गुलिस्ताँ महकता जरूर है।
डरता है दिल अब भी ज़माने की निग़ाहों से
चाहा है चाँद को शायद यही अपना क़सूर है।
बेशक़ कागज़ के फूलों में ख़ुशबू नही होती
इश्क़ के ख़ुमार से गुलिस्ताँ महकता जरूर है।