ना पूछो मुझसे कौन हूँ मैं,,
ना पूछो मुझसे कौन हूँ मैं,,
खुद की कहानियों से अनजान हूँ मैं।।
वक्त की ठोकरें मुझे हर पल दर्द देती रही,,
मेरी ख्वाहिशें मुझसे आँख मिचौली खेलती रही।।
सुकून की तलाश में दर-दर भटकती रही,,
मंजिल की अनजान राहों में धीमी गति से बढ़ती रही।।
अनचाहे से अरमान मेरे बार -बार मुझे झुंझलाते रहे,,
हमेशा की तरह इस बार भी मेरें आशायें उलझे रहे।।
कैसे समझाऊँ कि कितनी हताश हूँ मैं,,
खुद की कहानियों से अनजान हूँ मैं।।
ना पूछो मुझसे कौन हूँ मैं,,
खुद की कहानियों से अनजान हूँ मैं।।
खुद से किए वादें सारे टूट रहे,,
जीतने की इच्छाएं सारे रुठ रहे।।
कोशिशें सारी बिखर रही,,
उम्मीदें धुंधली पड़ने लगी।।
अपनी नजरों में स्वयं को तराशती हूँ ,,
लक्ष्य तक पहुँचने का राह बनाती हूँ ।।
खुद से ढे़रो सवाल करती हूँ ,,
निराशाओं के घेरे में आशाऐं तलाशती हूँ।।
कैसे समझाऊँ कि कितनी हताश हूँ मैं,,
खुद की कहानियों से अनजान हूँ मैं।।
ना पूछो मुझसे कौन हूँ मैं,,
खुद की कहानियों से अनजान हूँ मैं।।