#लघुकविता
#लघुकविता
सावन की अगवानी में।
(प्रणय प्रभात)
“धरा को तृप्त करता है, नई आशा जगाता है।
लुभाता है जो चातक को, जो मोरों को नचाता है।।
करे श्रृंगार कुदरत का, बदल डाले नज़ारों को।
छुपा दे बादलों में चांद, सूरज को सितारों को।।
जो सूनी शाख को, झूलों के संग म मल्हार देता है।
संवरने और सजने, तीज से त्यौहार देता है।।
उसे कहते हैं सब सावन, जो जादू बन के छाता है।
जो तन को छेड़ देता है, तो मन भी झूम जाता है।।
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संपादक
न्यूज़&व्यूज
(मध्यप्रदेश)