"जब पीड़ा अपनी परिभाषा बदल ले"
“जब पीड़ा अपनी परिभाषा बदल ले”
जब पीड़ा अपनी परिभाषा बदल ले,
तो आँसू सिर्फ दुख का प्रतीक नहीं रहते,
वो आत्मा की गहराई में उतरकर
एक मौन संवाद बन जाते हैं , स्वयं से।
जब पीड़ा अपनी परिभाषा बदल ले,
तो बिखरना अंत नहीं होता,
वो एक नये सृजन की पूर्वपीठिका बनता है,
जहाँ हर टूटन में छुपा होता है
एक नये आयाम का बीज।
जब पीड़ा अपनी परिभाषा बदल ले,
तो अकेलापन सज़ा नहीं लगता,
वो आत्मसमीपता का अवसर बन जाता है,
जहाँ हम भीड़ में नहीं,
ख़ुद में घर बनाना सीखते हैं।
जब पीड़ा अपनी परिभाषा बदल ले,
तो सवालों से डर नहीं लगता,
बल्कि उन्हीं से मिलती है वो रोशनी
जो अंधेरे को अर्थ देती है।
जब पीड़ा अपनी परिभाषा बदल ले,
तो जीवन सिर्फ घटनाओं की श्रृंखला नहीं,
बल्कि अनुभवों की साधना बन जाता है,
जो हमें भीतर से तराशती है,
जैसे कोई मूर्तिकार अपने अधूरे पत्थर को
दे रहा हो दिव्यता की अंतिम छवि।
क्योंकि कभी-कभी,
पीड़ा वही रहती है ,
बस हम बदल जाते हैं।
और यही बदलाव,
हमें संवेदनशील मनुष्य बनाता है।
©® डा० निधि श्रीवास्तव “सरोद”