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10 Jul 2025 · 2 min read

*लघुकथा:"प्रायश्चित : एक स्त्री की त्रासदी"*

“प्रायश्चित : एक स्त्री की त्रासदी”

कभी-कभी जीवन की सबसे बड़ी सज़ा वो नहीं होती जो समाज देता है, बल्कि वो होती है जो आत्मा खुद को देती है। प्रायश्चित, यह कहानी एक ऐसी स्त्री की है, जिसने सब कुछ पाया, लेकिन खो दिया अपना “स्वयं”। यह कहानी है सावित्री की।

“मुझे माफ़ कर दो…” ये शब्द थे सावित्री के, जो शहर के एक नामी अस्पताल में आईसीयू बेड पर लेटी थी। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। आंखें अब भी नम थीं, पर उनके पीछे एक अथाह पश्चाताप था।

सावित्री , उम्र लगभग पचपन, खूबसूरत, आत्मनिर्भर, और समाज में प्रतिष्ठित । वर्षों तक एक नामी कॉलेज की प्रिंसिपल रही। हर किसी की रोल मॉडल। लेकिन उसकी आत्मा, उसके भीतर का सच, किसी और ही राह पर चल रहा था।

सावित्री की शादी आनंद से हुई थी, एक सरकारी अधिकारी। एक बेटा था , मुकुल। जिसने कभी माँ से अधिक लगाव नहीं रखा। वजह थी , सावित्री की कठोरता।
जहां बाहर की दुनिया उसे ‘आदर्श’ मानती थी, वहीं घर में उसकी कठोरता, आलोचनात्मक दृष्टिकोण और नियंत्रण की प्रवृत्ति, सबको तोड़ रही थी। आनंद धीरे-धीरे मौन होता गया, और मुकुल विद्रोही।

एक दिन मुकुल ने कहा ,
“आपने कभी मेरी माँ बनने की कोशिश की ही नहीं। बस एक आदर्श महिला बनने की रेस में मुझे खो दिया।”
सावित्री चुप रही। उस दिन पहली बार उसकी आंखें डबडबा गईं।

किसी को पता नहीं था कि सावित्री की आत्मा पर एक और बोझ था , उसकी एक भूल, जिसे उसने 30 साल से सीने में दफ़न कर रखा था।

कॉलेज के शुरुआती दिनों में, एक छात्रा नैना उसके पास आई थी , डरी हुई, टूटी हुई। उसने अपने प्रोफेसर द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत की थी। सावित्री ने फाइल छुपा दी। कॉलेज की ‘प्रतिष्ठा’ को बचाने के लिए नैना को चुप करवा दिया।
कुछ महीनों बाद नैना ने आत्महत्या कर ली।

सावित्री ने बाहर से शांत रहना सीखा, पर भीतर नैना की चीखें गूंजती रहीं।

सेवानिवृत्ति के बाद सावित्री ने सबकुछ छोड़ दिया ; पैसे, घर, सम्मान और एक अनाथालय में सेवा करना शुरू किया। वहां वो दिन-रात बच्चों की सेवा करती रही, मगर मन का बोझ न घटा।

एक दिन एक युवती आई , उसकी आंखों में वो ही दर्द था जो कभी नैना की आंखों में था।
सावित्री ने उसे गले से लगा लिया और कहा ,
“इस बार नहीं, इस बार मैं तुम्हारे साथ खड़ी हूं।”
उस दिन सावित्री ने नैना की आत्मा से मौन क्षमा मांगी।

अस्पताल में उसकी अंतिम घड़ियां चल रही थीं। मुकुल उसके पास आया , वर्षों बाद।
“माँ, मैं आपको माफ़ करता हूं।”
सावित्री की आंखों से एक बूंद आँसू गिरा, मानो वर्षों से रुका कोई बर्फीला पहाड़ पिघल गया हो।

“मैंने भी खुद को माफ़ किया बेटा, बहुत देर बाद…”

सावित्री की मृत्यु उसके पुनर्जन्म की शुरुआत थी , आत्मा के उस रूप में जहां वो अब खुद को दोष नहीं देती, लेकिन भूलों को स्वीकारती है।

प्रायश्चित किसी मंदिर में दिया गया दान नहीं, आत्मा का वो ताप है जो खुद को जलाकर ही शांत होता है।

©® डा० निधि श्रीवास्तव “सरोद”

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