'पगली कहीं की’
तो तुम यहाँ हो !
अरी बावरी ! तू क्या जाने कहाँ-कहाँ न ढूँढा मैंने तुझको,
जूही की बगिया में, समतल बहती नदिया में,
पनिहारिन की गगरिया में,
हर गाँव-शहर की डगरिया में,
धूपिया दोपहरी में, हर घर की देहरी में ,
कहाँ नहीं ढूँढा मैंने तुझको !
और तू यहाँ !
सच ! सच-मुच पगली है तू !
मेरी इक भूल को इस कदर दिल से लगा बैठी,
कि खुद का ही अस्तित्व खुद ही मिटा बैठी।
निकल पड़ी घर से भटकने को,
निपट अकेली, बूझने को अपनी जीवन पहेली।
बुनने चली घरोंदा इन घास-फूस के तिनकों को
समेटती हुई,नार अलबेली।
चल वापस लौट आ,पर ठहर जरा,
रूप आँखों में उतार तो लूँ ये मद भरा।
कमर में खोंसा पल्लू ,बाट खोजते झुके से नैन,
काँधे पे बिखरी लटें, लूट रहें हैं मेरा चैन।
आ यहाँ !
बिन तेरे सूना है मेरा जहाँ,
तुझे ढूँढा मैंने न जाने कहाँ-कहाँ।
और तू यहाँ !