नवगीत: श्वांसें करें हवन
मोहपाश में बँधी आत्मा,
कैसे करे भजन।
भावों की आहुतियाँ देकर
श्वांसें करें हवन॥
अहंकार की हर
आहट पर,
मन का रहे दखल।
नित लालच की
मृगतृष्णा में,
गाता पाप ग़ज़ल॥
आवारा हो रही व्यवस्था,
घूमें नग्न बदन।
सम्बन्धो की सोंधी
खुशबू,
ढूंढ रहा आँगन।
त्योहारों की
अगुवाई को,
तरस रहा सावन॥
चतुराई का चोगा पहने,
चुगली करे डहन।
छल की छाया
तले दबे हैं,
नेह-प्रेम के स्वर।
संकोचों में सत्य
पराजित,
झूठ करे हर हर॥
इच्छाओं के अभिनंदन में,
लोभी हुआ चमन।
मूल्यहीनता के
पतझड़ में,
झरती रही वफा।
मौन खड़े हैं
धर्म-ध्यान सब
मन से उड़ी दया॥
संस्कृतियों की सिद्ध भूमि का,
बिगड़े नित्य चलन।
दिनेश कुशभुवनपुरी
सृजन तिथि: 09.07.2025