साहस भीतर उगता है
साहस भीतर उगता है
माफ़ करना
जैसे किसी और की गलती पर
दिल के आँगन में
एक दीप जला देना हो।
लेकिन माफ़ी माँगना
अपने ही अभिमान की राख से
फिर एक दिया गढ़ लेना है।
प्रेम कहना
जैसे बादल बन जाना हो
बरसने को तैयार।
मगर प्रेम निभाना
सूखे मौसम में भी
छाया बनकर टिके रहना है।
दूसरों से लड़ना
हाथ की मुट्ठी का अभ्यास है।
पर अपने भीतर के अंधेरे से लड़ना
हर रात
दीवार पर चढ़ती परछाईं से कह देना,
“मैं जानता हूँ तुम मैं ही हो”
यह साहस है।
युद्ध में उतरना
शस्त्र उठाना नहीं,
बल्कि शंका को चुप कराना होता है।
पर जब अपने ही
दो किनारों पर हों,
और तुम नदी की तरह बहते रहो
तो वह सहना,
वह देखना
किसी ऋषि की समाधि है।
दुःख में टूट जाना
एक सूखे पत्ते का पेड़ से गिरना है।
लेकिन उसी दुःख को
जड़ों तक भेज देना
और एक दिन
फिर से अंकुर बनकर फूट पड़ना,
यही असली साहस है।
साहस न तलवार है,
न घोषणापत्र
वह तो एक बीज है
जो हर बार टूटकर
फिर से धरती को थाम लेता है।
-देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’