दोहा सप्तक. . . . बारिश
दोहा सप्तक. . . . बारिश
आई बरखा याद से, हरे हुए सब घाव ।
अनायास होने लगे, आँखों से फिर स्राव । ।
बरखा की हर बूँद से, हरित हुई हर याद ।
धीमे-धीमे देह से, हुआ छुअन संवाद ।।
वातायन के पट खुले, हुआ नयन अभिसार ।
बरखा की बौछार से, भभक उठे अंगार ।
कड़ – कड़ कड़के दामिनी, घन गरजें घनघोर ।
पिया मिलन को धड़कनें, बहुत मचाती शोर ।।
गगरी छलकी नैन की, जब बरसी बरसात ।
कैसे बीती क्या कहूँ, मुझ बिरहन की रात ।।
आवारा बादल बड़ा, शोर करें घनघोर ।
नभ में पागल ढूँढते, कहाँ गगन का छोर ।।
देख – देख बारिश बढ़ा , अंतर्मन का ज्वाल ।
भीगा यौवन यों झुका , जैसे भीगी डाल ।।
सुशील सरना / 9-7-25