*सबकी अपनी अखियां जी*
गीत
सबकी अपनी अखियां जी
अपनी अपनी बतियां जी
नाच नचाए जी भर कर
ये सांसों की सखियां जी।
लोरी सुन कर सो जाते
बोली सुन हंसते गाते
होती जो आहट उठ कर
लेते अंक कलइयां जी
सबकी अपनी अखियां जी।
मूंदीं आँखें मौन अधर
सपने सारे तितर बितर
जब देखा मां का मुख तो
उतरीं नज़र बलइयां जी।।
सबकी अपनी अखियां जी।।
भूलें बिसरे उस पल को,
नैनो से रिस्ते जल को,
भृगु ध्रुव में युग बीत गया
हाथों में फुलझड़ियां जी।
सबकी अपनी अखियां जी।
कृष्ण शुक्ल भ्रम की रस्सी
सुख दुख की रस्सा कश्शी
डाल हिंडोला पिंग बढ़ा
जीवन की आवृतियां… जी
सबकी अपनी अखियां जी।
सूर्यकांत