दो पल को दुःख आता भाई
दो पल को दुःख आता भाई
क्यों इतना अकुलाता भाई।
धीरज तुम क्यों खोते हो
सुख भी तो है आता भाई।
मंजिल उसको मिलती है
ठोकर जो है खाता भाई।
लाख घना अंधियारा हो
भोर नहीं रुक पाता भाई।
a m prahari