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9 Jul 2025 · 1 min read

तू वरद पुत्र

///तू वरद पुत्र///

कुल गोत्र श्रेष्ठता का मानदंड नहीं है,
इन्हें घसीटना कोई धर्म नहीं है।
तू उठ चल इससे ऊपर अब जग में,
कुल ले चलना श्रेष्ठ कर्म नहीं है।।

कुल गोत्र यह पुरुषार्थ नहीं,
कुल साधक के हित अर्थ नहीं।
कुल देते हमें पुण्य विरासत,
पर इनसे होता मानव श्रेष्ठ नहीं।।

मानव तू विधाता का वरद पुत्र है,
विश्व यात्रा का पुण्य सूत्र है।
फिर क्यों होता व्यथित जगत में,
सारी जगती तेरी पालक औ मित्र है।।

जन मानस और मातृभूमि के हित,
किया समर्पित जीवन जिसने सारा।
प्रेम पुण्य की अतुल्य निधि लेकर,
तोड़ दिया मुमुर्षा भरी जीवन कारा।।

वही बढ़ता गया गगन में,
बनकर चमका हुआ सितारा।
मर कर भी वह पाते जग में,
यशस्वी हो सुधा गंग की धारा ।।

स्वरचित मौलिक रचना
प्रो. रवींद्र सोनवाने ‘रजकण’
बालाघाट (मध्य प्रदेश)

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