बोध विहारी
नमन करता हूँ उन चरणों को,
जहाँ से बोध प्रकाश उठे,
गुरुवर के शुभ सान्निध्य में,
मम अंतर में दीपक जले।
जिनकी वाणी अमृत-सी लगती,
जिनकी दृष्टि सुधा-संचार,
वे ही जीवन-मार्ग प्रदर्शक,
धन्य हुए हम बारम्बार।
गुरु बिना यह चेतना नितान्त,
जड़वत्, भ्रमित, नीरस होती।
वह ही चेतनता के पोषक,
जो सन्मार्गों की ओषधि बोती।
गुरु न केवल बोध-विहारी,
वरन् करुणा के सागर हैं।
जिनके कृपाकटाक्ष मात्र से,
शुद्ध हो जाते पाप-प्रहर हैं।
चरण-धूलि उनकी पावनतम,
वह श्रद्धा का मूलाधार।
जो उसे हृदय में धारण करे,
पाता है वह शान्ति अपार।
वे शिक्षक नहीं केवल मात्र,
वह संस्कारों के शिल्पकार।
जिन्होंने आत्मा को दी उन्नति,
बनाया जीवन को तपोविहार।
हे बोध-विहारी गुरुवर मेरे,
तुम ही पथ के दीप अनोखे।
शत-शत नमन आपके पग को,
सतत वन्दना हृदय में डोले।